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Showing posts from May, 2020

Magar Ki Leela

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jagatgururampalji.org/gyan_ganga_english.pdf Kabir Saheb met prophet Muhammad and gave him true spiritual knowledge, but due to increasing number of disciples, the his pride had magnified and hence he remained in the trap of Kaal (Satan) ham mohammad ko vahaan le gayo, ichchha roopee vahaan nahin raho. 1.The complete divine Kabir saheb has appeared in Satyuga by name Satsukrita, in Tretayuga by the name Munindra, in Dwapar Yuga, in Karunaamaya, and in Kaliyuga, in the name of Kavir Dev (Kabir God). Apart from this, he comes by appearing in other forms, and disappears after performing his marvels 2.In the Satyuga, when Almighty Kabir Saheb came on earth as Satsukrita, at that time, he imparted true spiritual knowledge to Garuda ji, Shri Brahma ji, Shri Vishnu ji and Shri Shiva ji etc. 3.Almighty Kabir took Swami Ramanand ji, Sant Dharmadas ji, Sant Garibdasji  , Sant Dadu ji and Sant Nanak Dev ji in Satyaloka and got them acquainted with his true self and ...

कबीर प्रकट दिवस

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Holy Yajurveda Chapter 29 Mantra 25 -   Siddhidho Adya Manso Durone Devo Devanijasi Jatveda.  A friend of the friend, the messenger of the law: Kavirsi Pracheta: 25.  Siddhidha-adya-manusha-durone-devah-devan-yaj-asi-jat-veda-a-f-he-mitrahamah-chikitavan-tatam-messenger: kavir-asi-prachaeta.  Translation - (Adya) today i.e. presently (Duroane) body form (fire) in the palace of misdemeanors ( Manishtha );  Gives the life of such a seeker and destroys spiritual practice.  In its place is the (Deva) deity of the (Deva) deities (Jatveda:) the real (Yaja) worship (Asi) of the absolute divine Satpurusha.  (Aa) compassionate, (friend): the real companion of the living being (Chiktivan) healthy knowledge ie true devotion (messenger) (messenger) in the form of messenger (he), (f) and (prakhata), the enlightening (tatam) you  ( KavirDev means Kabir Parameshwara) is Kabir (Asi).  Connotation: - At the time, the devo...

पर्यावरण का विकास

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आज से 5000 वर्ष पूर्व लोग दूर-दूर रहा करते थे गांव में ढाणी बनाकर दूर-दूर रहा करते थे और अपने सीमित साधनों से ही अपना गुजर-बसर कर लेते थे वह साधारण वह लोग साधारण जीवन शैली अपनाते थे उनको ज्यादा संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती थी  युग तो आते है जाते है,युगों के चक्रीय परिभ्रमण में धर्म के उत्थान और पतन का मूल कारक ईश्वर स्वयं होता है।प्रकृति के संतुलन के लिए यह आवश्यक है कि त्रि युगों के धर्म के तुल्य कलिकाल में अधर्म का प्रभाव बढे। वास्तविकता में कलिकाल की पूर्णाहुति में समय का बहुत बड़ा भाग शेष है,परन्तु वर्तमान काल (कलिकाल के 5000 वर्ष पश्चात) इसी कलयुग मे एक स्वर्णिम रुद्रराज्य स्थापित होगा ही जो रामराज्य के समान ही धर्म को सम्पूर्ण भूलोक में स्थापित करेगा।इस रुद्रराज्य कि आयु 1000 वर्ष तक होनी है जिसमे धर्म कृतयुग के स्तर तक उठ कर पुनः शैन शैन सतयुग के स्तर पर आएगा।इस रुद्रराज्य के स्थापित होने का यह संधिकाल है,जो अपनी पूर्णता पर ही है   100 साल का पर्यावरण कितना दूषित हुआ पर्यावरण  ( अंग्रेज़ी :  Environment ) शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ ह...

नास्तिकता पर आस्तिक ता का आक्रमण

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इस प्राइमटाइम के अंदर जहां तक मेरी सोच है वहां तक मैंने देखा है कि विश्व के 50% लोग नास्तिक है नास्तिक होने का मुख्य कारण यह है कि इनके पूर्वजों द्वारा जो साधना इन को बताई थी उनसे इनको किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ इतिहास को दोहरा जाए तो 5000 साल पहले धरती पर सारे मानव एक ही परमात्मा की भक्ति करते थे कुछ समय के प्रशांत नास्तिकता को बढ़ावा देने के लिए गौतम बुध नामक एक व्यक्ति का जन्म हुआ  नास्तिक  अज्ञानी व्यक्ति के कारण कई करोडो लोगों को नासिक ब बना दिया परमात्मा को निराकार बताया खुद भी तपस्या करते थे और दूसरों को भी तपस्या करने के लिए कहते थे खुद को कुछ लाभ हुआ नहीं और दूसरों को परमात्मा से नास्तिक बना डाला कुछ समय के बाद परमेश्वर की असीम रजा से एक पुण्यात्मा का जन्म हुआ  इन्होंने परमेश्वर के आज आदेश से नास्तिक मिटाकर आस्तिक ता की ओर  मानव समाज को  अग्रसर किया कुछ समय के बाद धीरेेे-धीरे परमेश्व ज्ञान धरती प्रचलित हुआ परंतु शंकराचार्य जी को पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान नहीं होने की वजह से फिर एक बार मानव समाज नास्तिक होनेे की कगार पर खड़ा हो गया वर्तमान समय क...

पुण्य करना अति अनिवार्य है

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दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान तुलसी दयाना छोड़िए जब लग घट में प्राण तुलसीदास जी भी हमें बताते हैं कि दान करना अति अनिवार्य है और वह भी समय-समय पर  जैसा कि आप चित्र में देख रहे हैं  यह चित्र में संकेत कर रहा है कि  कोई बेजुबान ओं पर भी दया करें  और इंसानियत का क्रम  और धर्म भी है यही कहता है 

कोविड-19

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कोरोनावायरस से बचा ने के लिए भारत के महान योद्धा  दिलो जान से प्रयास कर रहे हैं  ऐसे महान योद्धाओं को  बहुत बहुत धन्यवाद   बनाने वाले ने क्या खूब चित्रकारी बनाई है